फसल मौसम कैलेण्डर

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फसल मौसम कैलेण्डर for the states viz. Tamilnadu, Andhra Pradesh, Kerala, Himachal Pradesh, Assam, Gujarat, Orissa and Rajasthan have already been published. Up-to-date crop weather calendars for Karnataka, West Bengal, Maharashtra, Bihar and Madhya Pradesh will be published shortly, while that of New Delhi, Punjab and Uttar Pradesh will be started soon. This provide information on crop growth stages, normal weather for crop growth, warnings to be issued based on prevailing weather condition, water requirement of crops during their various phytophases, meteorological conditions favourable and development of crop pests and diseases. This publication is prepared for major crops grown in the states of the country. These calendars are useful for crop planning, irrigation scheduling and plant protection measures.

Information on normal weather conditions, water requirements of crop etc., are of vital importance for effective crop planning and for maximising and stabilising food production in the country. More than two decades back the above information was prepared in a pictorial form,called Crop Weather Calendars, for major cereals,pulses and oilseeds crops in the country on a districtwise basis.

पादप अनुवांशिकी प्रजनकों तथा जैव-प्रोद्यौगिकियों द्वारा नई विकृतियों के नविनतम परिचय और कृषि में बदलते परिदृष्य के साथ पूर्ववर्ती फसल मौसम कैलेण्डर अपनी उपयोगिता खो चुके हैं । इसीलिए, पिछले दो दशकों के दौरान कृषि मौसम विज्ञान सहित कृषि विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे गतिशील प्रगतियों को देखते हुए इन कैलेण्डरों में संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई ।

वर्तमान शस्य पद्धति, मृदा प्रकार, मौसम और अन्य घटकों की पद्धतियों को ध्यान में रखते हुए संशोधित फसल मौसम कैलेण्डर अब बनाए गए हैं । इन कैलेण्डरों में विभिन्न वनस्पति अवस्थाओं के दौरान फसल की जल आवश्यकता, फसल रोगों के विकास के लिए अनुकूल मौसम विज्ञान स्थितियों जैसे घटक सम्मिलित है ।

कैलेण्डरों में दी गई जानकारी विकास की दिशा के बृहत लक्षण दर्शाते हैं जो योजनाकर्ताओं, कृषि प्रशासकों, पादप प्रजनकों तथा किसानों को पादप प्रजनन, फसल अपनाने, अनावृष्टि रोधन, अनुपूरक सिंचन, उपज बढाने संबंधी नीतियां बनाने में सहयोगी साबित होंगे ।